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रविवार, 20 जून 2010

लहर का किनारा

पितृ दिवस पर मेरी यादों के झरोखे से:

कभी कहीं कुछ ऐसा घट जाता है
लहर जिससे मिलने आती है
वो किनारा ही हट जाता है

मीठी मधुर ठंडी पवन
झकझोरती है तन मन
वो ही उठा कर आग
सब जला डालती है
एक मंदिर झर जाता है
एक बाग उजड़ जाता है । लहर जिससे .................

कोई निकटतम व्यक्ति अपना
एक स्वप्न बन जाता है
और फिर नींद नहीं आती
करवट बदल बदल कर
समय, असमय कट जाता है
वक्त बदल जाता है । लहर जिससे .....................

शाम की मुंडेर पर
बैठा नीरस सूरज
अचानक डूब जाता है
एक अटूट विश्वास
सा जम जाता है
तब दीपक अचानक
बुझ जाता है । लहर जिससे ...................

कभी-कभी हृदय
भावनाओं से
इतना भर जाता है
कि असह्य हो जाता है
जहाँ भी जाओ
हर आदमी अपना
साथी नजर आता है । लहर जिसके .................

-------प्रकाश टाटा आनन्द

उपरोक्त कविता कि रचना 18.10.1995 में मेरे हृदय से निकली । मन व्याकुल था और तभी एक पुस्तक में किसी की रचना पढी "कभी कहीं कुछ ऐसा घट जाता है नदी जिसके भरोसे होती है वो किनारा ही कट जाता है"
बस मेरा मन भी व्यवहल  हो गया पिता को बिछ्ड़े अभी एक महीना ही हुआ था और क्या लिखू .........

2 टिप्‍पणियां:

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ ने कहा…

ब्लाग पर आना सार्थक हुआ
काबिलेतारीफ़ है प्रस्तुति
आपको दिल से बधाई
ये सृजन यूँ ही चलता रहे
साधुवाद...पुनः साधुवाद
satguru-satykikhoj.blogspot.com

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ ने कहा…

सुन्दर शब्दों की बेहतरीन शैली
भावाव्यक्ति का अनूठा अन्दाज
बेहतरीन एवं प्रशंसनीय प्रस्तुति
हिन्दी को ऐसे ही सृजन की उम्मीद
धन्यवाद....साधुवाद..साधुवाद
satguru-satykikhoj.blogspot.com