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गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

मेघदूत परिसर के मंच पर एतिहासिक पीपल के नीचे वसंती हवा की ठन्डक सभी कलाकारों एवं श्रोताओं के तन-मन को शीतल कर रही थी। आसाम से आए आयोजक “तालीम” संस्था ने वसंत पंचमी के उपलक्ष में कल रात 15 फरवरी 2017 की सुगंधित संध्या में संगीत का कार्यक्रम आयोजित किया था। पं विजय शंकर मिश्र की मधुर और शास्त्रीय ज्ञान से ओत-प्रोत वाणी से कार्यक्रम की उद्घोषणा और पं रोहित आनंद द्वारा सम्मोहित करने वाला बाँसुरी वादन। भिन्न षड़ज के स्वरों के साथ वसंतोत्सव मनाते रोहित जी ने आधे घन्टे तक रसिक जनों को इस तरह मंत्र मुग्ध किया कि लोग नयन मूंदे सुनते रहे। रोहित जी का तबले पर साथ दिया श्री मनोज नागर जी ने। मनोज नागर जी और रोहित जी की जोड़ी कई दशकों से संगीत सभाओं में रसिकों को आनंदित करती रही है। और श्री कृष्ण कृपा से आगे भी यूँ ही समाँ बांधती रहेगी। रोहित जी के होनहार शिष्य अभिनव यादव ने भी गुरु का बखूबी साथ निभाया। गुरु के कदमों पर कामयाबी से कदम रखते हुए खूब प्रशंसा बटोरी। कार्यक्रम की कुछ झलकियों का आप भी आनंद लें।





मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

Pt. Rohit Anand, Hindustani Flautist and Musicopath is going to present his flute recital on 15.2.2017 at Meghdoot Auditoriium-1, Rabindra Bhavan, Ferozeshah Road (Mandi House). Programme will start at 5.30 pm. All are cordially invite for the programme. For more details please see the invitation. Please do come and join the evening on the occasion of Basant Panchmi.

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

स्वीकार है मुझे

एक लम्हा कहीं, अपना सा मिले
एक लम्हा कभी, सपना सा लगे
यूँही पल-पल में गुज़र जाना स्वीकार है स्वीकार है मुझे
हर कदम पर ये हमने पाया है
हम सफर है जो अपना साया है
यूँ ही सायों में सिमट जाना स्वीकार है स्वीकार है मुझे
गर सितारों की चमक अधूरी है
रात रोशन हो क्या ज़रूरी है
यूँ ही जुगनूँ सा चमक जाना स्वीकार है स्वीकार है मुझे
एक शम्मां जली जलती ही रही
उससे रोशन रही दुनिया की गली
यूँ ही जल-जल के पिघल जाना स्वीकार है स्वीकार है मुझे
कोई तुझसा कहीं जहाँ में पाऊँगी
फिर से दुनिया में मैं लौट आऊँगी
यूँ ही मर-मर के  उबर जाना स्वीकार है स्वीकार है मुझे
मेरी चाहत गर, कहीं जाने से मिले
कभी फलक पर, कभी ज़मीन तले
यूँ ही चल-चल के भटक जाना स्वीकार है स्वीकार है मुझे
घनी पलकों के किनारों की नमी
तेरे कदमों को, रोक ले न कहीं
तेरा मुड़ मुड़ के पलट जाना स्वीकार है स्वीकार है मुझे

------------ प्रकाश टाटा आनंद (सर्वाधिकार)

शनिवार, 18 जुलाई 2015



8 अगस्त2015 समय सायं 7 बजे प. रोहित आनंद का बाँसुरी वादन और सुमित आनंद पांडे का ध्रुपद गायन, दिल्ली के इंडिया हैबिटाट सेंटर, लोधी रोड में होने जा रहा है, याद रखिएगा। आप सभी मित्र एवं बन्धु अपना कीमती समय निकाल कर अवश्य पधारें। आपका आशीर्वाद अनिवार्य है... कोई बहाना नहीं चलेगा.





सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

ब्रह्म, विवस्वान से अनवरत

मन उद्विग्न सा
निरंतर, अनवरत
एक विचार झरता है –

आँखे, अपलक
निहारती हैं
अश्रु से गला भरता है –

उस सर्वज्ञ का ज्ञेय
अनादि काल से
नदी सागर भरता है –

फिर भी हृदय में
एक प्रश्न बार – बार
कोलाहल करता है –

कैसे कहीं जाये
पँहुचे वहाँ जहाँ
पृथ्वी की पावनता है –

जहाँ सूर्य प्रकाश को
कोई दल-बादल
तम में नहीं बदलता है –

जहाँ बिन बादल
धवल मेह
निर्झर बरसता है –

जहाँ अशरीर
अस्तित्व प्रतिक्षण
सराबोर भीजता है –

जहाँ सोम देव
अहोरात्र धवल
उत्सर्ग बरसता है –

वहाँ विवस्वान भी
दिवा रात्रि
दैदीप्यमान रहता है –

यम भय से अंजान
अंधकार भी
विलुप्त सदा रहता है –

अवतरण लीलाओं का
प्रेक्षापट मेरे समक्ष
प्रकट करो
संदेह दूर करो प्रभो
मन उद्विग्न सा रहता है –

तब शिव ने डम डम
निनाद कर
पालनकर्ता की
अद्भुत लीला का
बखान किया ---


युग युग तक
धर्म रक्षा हेतु
धरा पृष्ठ को जिसने
आसुरी प्रभाव से
मुक्त किया ---

यम भय कम्पित
त्रस्त, आतंकित जग को
अभय दान दे
आशा से तृप्त किया ---

बार-बार धरा पर
मत्स्य, कश्यप से कल्कि तक
स्वयं अवतरण किया ---

ब्रह्मा से मनु और
विवस्वान से पृथापुत्र को
गीता का ज्ञान दिया ---

जन्म मृत्यु जरा व्याधि
के काल चक्र से
जो उसको
जब जान गया ---

क्षण प्रतिक्षण जिसने
मन वाणी बुद्धि
से दर्शन पान किया ---

यही शाश्वत है
आत्मसात कर वह
मोक्ष तक पँहुच गया ---

बोले काम रिपु, हे शैलजा
जो पान कर चुका
गरल हो उसके प्रत्यक्ष
संदेह क्यों होता है ---

वही सर्वज्ञ जो
अवतरण दृष्टा
वही ब्रह्माण्ड जन्मता है ---

अवतरण पर्व
निरंतर होता है जहाँ
वहाँ व्यर्थ उद्विग्नता है ---

इंदु ज्योत्सना
रवि का देदीप्य
वहाँ अनवरत
झरता ही रहता है ---

हे गिरिजा क्या
अब भी है कुछ मान – भान
क्या अब भी मन में
कुछ संदेह पलता है !

--------      प्रकाश टाटा आनंद  29.1.2014