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मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

रजनीगंधा ....


बेसुध निद्रा में सोई थी
सपनों में मैं खोई थी
आकर मेरे सिरहाने पर
कोई रजनीगन्धा सजा गया
मन में सुगन्ध बसा गया, कोई रजनीगन्धा सजा गया....

तम की गहरी रात ढ़ली
उषा ने फिर बात कही
कानों में चुपके से आकर
कोई गीत मधुर बजा गया
मन में सुगन्ध बसा गया, कोई रजनीगन्धा सजा गया....

होंठों पर मुस्कान खिली
यूँ आई फिर नहीं टली
श्याम् सलौना पनघट पे आ
मुरली मधुर बजा गया
मन में सुगन्ध बसा गया, कोई रजनीगन्धा सजा गया....

चाहत को नई दिशा मिली
मन मन्दिर में कली खिली
अमृत धार पिला दर्शन की
भव सागर पार लगा गया
मन में सुगन्ध बसा गया, कोई रजनीगन्धा सजा गया....
                                     -------- प्रकाश टाटा आनन्द

सोमवार, 2 जनवरी 2012

भोर

दूर क्षितिज पर संध्या सिंदूर लगाये ,
मन ही मन प्रसन्नता से भर रही है ।
चारों ओर पक्षियों का कलरव ,
रक्तिम कपोल वधू सी लजा रही है।

उसके यौवन के क्या कहने,
आंचल में निशा के सिमटी जा रही है।
पाने को किसी के भाग्य का सूरज ,
क्या-क्या प्रपंच रचा रही है।

और इधर सूरज भी छोड़ पूरब को ,
मदमस्त उधर ही चला जा रहा है।
आँखों में अश्रु, मन बुझा-बुझा सा,
पूरब अपलक उसे निहार रहा है।

पर वह कहाँ है रुकने वाला,
उसे तो केवल अब चलना है।
जलता छोड़ विरह में पूरब को,
पश्चिम को खुशहाल करना है।

सुंदरी संध्या सोलह श्रृंगार कर ,
रूप यौवन से रिझा रही है।
छलनामयी अपने प्रेमी को,
निष्ठुर छलती ही जा रही है।

आखिर छला गया सूरज भी,
कूद गया वह स्वयं आग में।
छोड़ गया था स्वर्ण प्रिय को,
जलना ही था उसके भाग में।

कुछ पल की थी वह खुशहाली
छा गया हर ओर अंधकार।
लाख छटपटाया पर बच न पाया,
कौन सुनता अब उसकी पुकार ।

क्या किया था पूरब ने जो,
छोड़ चला वो पश्चिम ओर।
पर पूरब के द्वार खूले हैं,
फिर लौटा लायेगी कल भोर ......

               ----------------  प्रकाश टाटा आनन्द
                                             31.10.1989

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

जनप्रिय लेखक ओम प्रकाश शर्मा जी को श्र्द्धांजलि


आज जब मैने श्री विरेन्द्र शर्मा जी के फेसबुक से ये जाना कि मेरे प्रिय और आदर्श लेखक श्री ओम प्रकाश शर्मा जी की आज पुण्य तिथि है तो मन विह्वल हो उठा। मैं बचपन से ही उनकी रचनाये पढ्ती रही हूँ. मैं नहीं जानती कि कब किस उम्र में वो मेरे आदर्श बन गये। आज मैं जो कुछ भी लिखती हूँ उसमें शर्मा जी के ही विचारों की झलक होती है। विरेन्द्र शर्मा जी मेरी भावपूर्ण श्रद्धांजलि स्वीकार करें। उनकी कमी तो सदा रहेगी ।
मैंने यह कविता अपने पिता की याद मैं लिखी थी जो आज मैं स्वर्गीय ओम प्रकाश शर्मा जी को समर्पित करती हूँ। मेरे श्रद्धासुमन .......


कभी कहीं कुछ ऐसा घट जाता है
लहर जिससे मिलने आती है
वो किनारा ही हट जाता है

मीठी मधुर ठंडी पवन
झकझोरती है तन मन
वो ही उठा कर आग
सब जला डालती है
एक मंदिर झर जाता है
एक बाग उजड़ जाता है । लहर जिससे .................

कोई निकटतम व्यक्ति अपना
एक स्वप्न बन जाता है
और फिर नींद नहीं आती
करवट बदल बदल कर
समय, असमय कट जाता है
वक्त बदल जाता है । लहर जिससे .....................

शाम की मुंडेर पर
बैठा नीरस सूरज
अचानक डूब जाता है
एक अटूट विश्वास
सा जम जाता है
तब दीपक अचानक
बुझ जाता है । लहर जिससे ...................

कभी-कभी हृदय
भावनाओं से
इतना भर जाता है
कि असह्य हो जाता है
जहाँ भी जाओ
हर आदमी अपना
साथी नजर आता है । लहर जिसके .................

-------प्रकाश टाटा आनन्द

उपरोक्त कविता कि रचना 18.10.1995 में मेरे हृदय से निकली । मन व्याकुल था और तभी एक पुस्तक में किसी की रचना पढी "कभी कहीं कुछ ऐसा घट जाता है नदी जिसके भरोसे होती है वो किनारा ही कट जाता है"
बस मेरा मन भी व्यह्वल्  हो गया पिता को बिछ्ड़े अभी एक महीना ही हुआ था और क्या लिखू .........

गुरुवार, 22 सितंबर 2011

अब न कभी शरमाऊँगी...


एक बार मिल जाओ प्रिय
अब न कभी शरमाऊँगी....

श्याम् सलोने रूप के प्यासे
नयन कटोरे भर-भर छलके
नींद कहाँ आई केशों तक
बिखरी मेरी पल-पल अलकें
स्वप्न में ही आ जाओ प्रिय
अब न कभी शरमाऊँगी....

रैन बिताई तारे गिन-गिन
दिन बीता और समय चला
पीत वर्ण हो गया समस्त नभ
प्रिय विरहा में सूर्य गला
प्रेम का दीप जलाओ प्रिय
अब न कभी शरमाऊँगी....

चिर प्रतीक्षा में प्रियतम् मेरे
पलकों से पंथ बुहारा था
तुम आये और चले गये
आखिर क्या दोष हमारा था
एक बार फिर आओ प्रिय
 अब न कभी शरमाऊँगी....

देख कर यूँ छवि तुम्हारी
मन वीणा के तार बजे थे
लाज की मारी विरहणी थी
आँचल में भी नयन मुँदे थे
कोई तो समझाओ कि प्रिय
अब न कभी शरमाऊँगी....

लाज का घूँघट आड़े आया
न समझे क्यूँ ढ़लका आँचल
छोड़ चले जलती विरहा में
लाख पुकारा रोई पल-पल
यूँ न छोड़ के जाओ प्रिय
अब न कभी शरमाऊँगी....

तुम क्या जानो कब-कब मैंने
कैसे सहा तुम्हारा जाना
मूक आग्रह घूँघट में था
तुमने उसको न पहिचाना
फिर से मुझे बुलाओ प्रिय
अब न कभी शरमाऊँगी....
                                      -----------प्रकाश टाटा आनन्द (1990)
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सोमवार, 29 अगस्त 2011

नव भारत टाइम्स से...

भाई जी, अन्ना तो चले गए पर अपना रूटीन बिगाड़ गये.. सुबह उठते ही रामलीला मैदान पहुँचना, अन्ना  की रसोई से गरमा गरम नाश्ते के बाद पालिटिक्स  पर चर्चा करना,  नारेबाजी, देशभक्ति का जोश....  पर अब फिर वही पार्क की सैर करनी होगी।

------ प्रद्यूत व आलोक भदौरिया.